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आरोग्य की कहानियां

ऐसे लोगों से मिलें जिन्होंने अपनी कहानियां साझा की हैं – अनेक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से उबरने वाले जीवन के वास्तविक अनुभव जानें। सुनें कि किस प्रकार उन्होंने हार नहीं मानी, उनके संघर्षों को देखें और उनकी सफलता के बारे में पढ़ें।

इस परिस्थिति से उबरना संभव है, जरूरत है तो थोड़ी सी इच्छाशक्ति, और थोड़े मदद की। इसके लिए आपको सारी आवश्यक प्रेरणा यहां मिल सकती है। उन लोगों के वास्तविक जीवन का वर्णन देखें जो विभिन्न प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों से उबर पाएं हैं और आरोग्य लाभ की प्रेरक कहानियां पढ़ें।
वास्तविक जीवन की कहानियां
आप अकेले नहीं हैं। ऐसे अन्य लोग हैं, जिनके पास ऐसे ही सवाल, चिंताएं और संदेह हैं।किसी से बात करें चिकित्सक को खोजें
14 दिसंबर 2017
अवसाद की डायरी
अवसाद या व्यग्रता के अचानक सामने आने पर जिंदगी एक समान नही रह जाती है। यह जीवन का रूख़ बदल देता है और व्यक्ति भावनात्मक भंवर में फँस जाता है।
हाय, मेरा नाम नंदिता सिंह है, और यह मेरी बिखरी-बिखरी सी कहानी है। स्कूल में, घर में, और अब कॉलेज में बिताए मेरे जीवन के कुछ टूटे फूटे ब्यौरे, मेरे दिल की उलझन बताने की कोशिश करते हैं। मैं बस इतना चाहती हूं कि जब कभी भी आपको ऐसा लगे कि पूरी दुनिया आपको निगल जाना चाहती है, तो सदैव यह बात याद रखें कि आप कभी भी अकेले नहीं हैं और न ही होंगे।
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“किसी को नहीं पता कि मस्तिष्क वैसे क्यों काम करता है जैसे वह करता है।”
जॉन ब्राउनली उनके पिता को अवसाद से जुझते देखने का अपना अनुभव हमारे साथ बांट रहे हैं।

मेरे पिता अन्य पिताओं की तरह नही थे। इस बात का अहसास मुझे पहली बार तब हुआ जब वह बिस्तर पर सीधे होकर उठ बैठे, उनकी आंखों में अचम्भा भरा हुआ था, और उन्होंने चीखना शुरू किया: “कौन हो तुम? यहां क्या कर रहे हो?”


बाद में मैं चतुर बन गया था, लेकिन उस समय मैं शायद तीन या चार साल का था, और इसी लिए तब मैं उनसे यह नहीं कह पाया जो अब कहता हूं: “सुनिए, अगर यह किसी को पता होना चाहिए तो वह आप हैं।”


एक क्षण पहले मैं अपने माता पिता के बिस्तर के एक कोने में बैठकर गली गली सिम सिम देख रहा था। मेरे पिता सोये हुए थे। वह पिछले कुछ दिनों से बिमार थे, इसलिए उस दिन वह काम पर नहीं गये थे। काफी देर हो गई थी शायद, क्योंकि मेरी मां, जो खुद भी काम करती है, घर पर थी। वसंत या गर्मी का मौसम रहा होगा क्योंकि बाहर तब भी उजाला था।


या शायद सर्दी के समय का सप्ताहांत था। 35 साल पुरानी याददाश्त पर आप पूरी तरह से कैसे भरोसा कर सकते हैं? बस मुझे इतना याद है कि मैं जब भी उस दिन के बारे में सोचता हूं, मुझे यह याद आता है कि यह घटना शाम को घटी थी। वसंतऋतु में। और मेरे पिता तब भी वहीं थे, तब भी जिंदा थे, मेरे छोटे कंधों को पकड़कर मुझे झकझोर रहे थे और चिल्ला रहे थे।


“कौन हो तुम? यहां क्या कर रहे हो?”


नीचे से मेरी मां ने आवाज़ें सुनी। सीढ़ियों से चिल्लाई, “ब्रुस? क्या हुआ?”


उनकी कांपती हुई आवाज़ में छिपे त्रास से मेरे विक्षिप्त पिता का ध्यान उस छोटे से कांपते हुए बच्चे, जिसे वह अपने हाथों से झकझोर रहे थे, से हटकर एक नई निशाने पर जा टिका। (क्या उन्हें यह पता था कि मैं एक बच्चा था, यह तो छोड़ ही दें कि उनका बच्चा था? क्या वह इतना आगे निकल गए थे? एक और सवाल जिसका जवाब मुझे नहीं पता।) मुझे एक कोने में पटकते हुए वह बिस्तर से छलांग मारकर उठ जाते हैं, और जितनी देर में मैं खड़ा हो पाता हूं, कमरा खाली हो चुका है।


मैं सिसकियॉ भरते हुए कारिडर में उनका पीछा करता हूं, एक छोटे से बच्चे से उस अभिभूत करने वाले अपराधबोध को महसूस करता हुआ, जिसका दिल उसके आत्मवाद के नयेपन के नीचे कुचला जा रहा था। मेरे पिता के साथ जो भी समस्या थी, उसका कारण अवश्य ही मैं था। लेकिन मुझे इस बात का अंदेशा नहीं था कि मैंने किया क्या था।


“मुझे एक क्षति का आभास हो रहा था; जैसे मैंने शरीर का कोई अंग खो दिया हो, लेकिन ऐसा नहीं था।”
एक महिला अपने गर्भपात और एक रिश्ते के टूटने के दर्दभरी कहानी बता रहीं हैं

जागने के बाद मुझे एक अजीब खालीपन ने घेर लिया। मेरे हाथ कांप रहे थे, मेरा मन भटक रहा था और मुझे बहुत ज़्यादा बेचैनी महसूस हो रही थी। मुझे एक क्षति का आभास हो रहा था; जैसे मैंने शरीर का कोई अंग खो दिया हो, लेकिन ऐसा नहीं था। अंधकारमय छोर मेरी ओर बढ़ रहा था और मैं आगे के जीवन के बारे में सोच नहीं पा रही थी। मैं अपने कम्प्यूटर स्क्रीन की तरफ एकटक देखती रहती, हर घड़ी को गिनती रहती, हर घड़ी एक पहर जैसा लगता था।


मुझे गर्भपात करवाना पड़ा था। उस समय जब मैं प्रसव के बारे में कुछ नहीं जानती थी, मुझे गर्भपात करवाने को कहा गया। और इसके लिए जो आदमी जिम्मेदार था वह अपनी सुविधानुसार चलता बना क्योंकि उसे लगा वह इस सदमे को झेलने के लिए बहुत छोटा था। इस शारीरिक और मानसिक पीड़ा से मुझे अकेले जुझना पड़ा। मुझे यह भी समझ नहीं आया कि मैं क्यों किसी ऐसे व्यक्ति के साथ रिश्ता खत्म हो जाने का मातम मना रहा थी जो इतना गैरजिम्मेदार था। गर्भपात के दूसरे दिन मैं मानसिक रूप से पूरी तरह से टूट गई। अगले दिन मुझे खालीपन, उदासी और शून्यता महसूस हुई। मुझे बताया गया था कि मुझे सिर्फ आठ मिनट के लिए बेहोश किया जायेगा और बाद में मुझे थोड़ी सी तकलीफ होगी। उन्होंने झुठ कहा था। इस घटना ने मेरे जीवन के अगले तीन सालों को बर्बाद कर दिया। जो इन्सान 6 सालों से मुझसे यह कह रहा था कि वह मुझसे प्यार करता है, वह रिश्ते में बंधने के डर से भाग खड़ा हुआ। मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या हुआ।


धीरे-धीरे मेरा आत्मसम्मान घटने लगा। मैं चिडचिडी, गुस्सैल और सामाजिक स्थितियों में बेअदब-सी रहने लगी। मुझे डरावने सपने आते और मैं देखती कि मेरे सामने मेरे बच्चे के टुकड़े किये जा रहे हैं। खुद को कमरे में बंद कर लेती और घण्टों रोती रहती। सोने जाती यह सोचकर कि अगली भोर न देखनी पड़े। मैं डरपोक नहीं थी लेकिन चाहती थी कि हर दर्द को अपने जीवन से हमेशा के लिए मिटा दूँ। अपराधबोध और शर्म के मारे अपनी कहानी मैं किसी के साथ साझा नहीं कर पा रही थी। जिस दिन मैंने यह तय कर लिया कि इस दर्द से मुझे छुटकारा चाहिए, मेरे मन के किसी कोने से उठी एक आवाज़ ने मुझे मदद माँगने को कहा। मैंने ऑनलाइन पढा और एक थेरेपीस्ट के पास गई बिना किसी उम्मीद के। मुझे विश्वास था कि कोई मेरी मदद नहीं कर सकता है। मैंने अपनेआप को एक कमरे में बैठा पाया और एक महिला मुझे मेरे जीवन और चयन को लेकर सवाल कर रही थी। मैं बैठी रही, लेकिन मैंने यह ठान लिया था कि किसी सवाल का जवाब नहीं दूँगी। वह धैर्यपूर्वक इंतज़ार करती रही। बिना कुछ बताए मैं उस दिन लौट आई लेकिन उस खामोशी ने मुझे मजबूर किया वापस जाने के लिए। दोबारा जब मैं उस थेरेपीस्ट से मिलने गई, मैंने अपने दिल में छुपे हर राज़ को बिना रोकटोक बाहर आने दिया। मुझे अब यह डर नहीं था कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे। यह मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था। उन्होंने मेरी मदद की भविष्य के लिए वास्तविक उद्देश्य स्थिर करने में और अपनी भावनाओं को पहचानने और उनको सकारात्मक दिशा देने में। शुरू में मैं दवाई लेने से झिझक रही थी लेकिन धीरे-धीरे बेहतर महसूस करने लगी।


अब मैं एक अच्छी जगह पर हूँ और खुश हूँ कि मैंने अवसाद के साथ मुकाबला करना और उसके साथ चलना सिख लिया है।


“सैकड़ों लोगों के साथ खड़े रहना लेकिन फिर भी अकेला महसूस करना”
डॉ चार्वी अवसाद के साथ अपने संघर्ष की व्याख्या कर रहीं हैं

मैं डॉ चार्वी मुरारी हूँ और मैं एक दंत चिकित्सक हूँ। चार साल से अधिक समय तक मैंने अवसाद के साथ संघर्ष किया। सौभाग्य से, मेरे परिवार और दोस्तों ने इसपर जीत प्राप्त करने में मेरी मदद की और बहुत समर्थन दिया। मेरे संघर्ष की यह एक झलकी है (अंग्रेज़ी में लिखी कविता का भावार्थ):


समय खाली-सा लगता है
मेरी नज़र के सामने से बहता जाता है
और मैं खड़ी रहती हूँ, डरी सी
आगे क्या होने वाला है इससे अंजान
एक ऐसे भविष्य के लिए प्रार्थना करती हुई जब मैं निडर बनूँगी
स्वयं को मज़बूत बनाने की कोशिश करती हुई…
हर रात आख़िरी लगता है
सूरज मुर्झाया सा लगता है
एक गीत जो सुनाई देकर भी नहीं देता
उस बोझ के साथ सो रही हूँ जिसे और ढो नहीं पा रहीं हूँ
दर्द, क्षति, व्यथा… हाँ, यहीं है, अभी है!
लोग कहते है कि हार आपेक्षिक है
उन्हें क्या पता जब यह हावी होता है, सबसे ताकतवर बन जाता है
उत्साह खो देती हूँ दिल और आत्मा उड़ेलने की
जीवन की सम्भावनायें अपरिमित है लेकिन मुझे अपना लक्ष्य नहीं पता
हर दिन अपना मूल्य साबित करना पड़ता
जो दिखाना नहीं उसे छुपाना
हंसी को बनाएं रखना और आक्रोश को छुपाते रहना
अपने टुकड़ो को जोड़ते रहना यह जताने के लिए कि मैं टूटी नहीं हूँ
सैकड़ों लोगों के साथ खड़े रहना लेकिन फिर भी अकेला महसूस करना
मुझे पता है वे नहीं समझेंगे और ऐसा मैं चाहती भी नहीं
हर किसी को अपने बारे में समझा नहीं सकती, हर रोज़, हर बार
अब जब यह अकेलापन मेरा सहारा बन गया है, अंधेरा अलौकिक लगता है
लेकिन दिल के किसी कोने में यह पता है
एक भविष्य ऐसा भी होगा मेरा महिमामय और ओजस्वी
जैसे टूटें कांच के टुकड़े चमकते है पाक और उज्जवल सितारों से


“मैं यह नहीं समझ पा रही थी कि मैं ऐसा व्यवहार क्यों कर रही थी।”
कादम्बरी अवसाद और द्विध्रुवी विकार (बाइपोलर डिसऑर्डर) के साथ अपने 35 सालों के संघर्ष का वर्णन कर रहीं हैं।

बचपन से मैं बाइपोलर डिसऑर्डर, व्यग्रता, घबराहट और अवसाद से जुझ रही हूँ। यह मानसिक रोग पिछले 35 सालों से मेरे दुश्मन हैं। मुझे हमेशा लगता था कि मैं इन्हें पस्त कर दूँगी। पर उन्होंने भी मेरे खिलाफ काफी तगड़ी साजिश रची थी। लेकिन मैंने अपने अंदर हिम्मत बांध ली है और उम्मीद है कि जीवनभर मैं इससे जुझ पाऊँगी।


सिर्फ 10 साल की थी जब मैं कमरे के कोने में सहमी सी खड़ी थी, मार खाने के बाद कांप रही थी। मैंने घर के बड़ो की तरफ मदद के लिए देखा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे किस बात की सज़ा मिल रही थी। मुझे पता था कि मैं अपने माता-पिता को परेशान करती थी और अपने भाई–बहनों से अलग थी। अपने अद्भुत आचरण से दूसरों को चोट पहुँचाने का अपराधबोध मेरे अंदर था। लेकिन उन दिनों मानसिक रोगों के विषय में इतनी जागरुकता नहीं थी।


मंच पर अपने प्रदर्शन के दौरान मैं घबराई रहती और कांपती रहती। मैं आत्मविश्वासी और बहिर्मुखी थी, लेकिन धीरे-धीरे अंतर्मुखी और कम बोलने वाली लड़की बन गई। मुझे लगता था कि मैं दुनिया को जीत लूँगी, लेकिन जैसे-जैसे बड़ी होती गई मुझे लगने लगा कि मेरा स्तर साधारण से भी नीचे था। मैं अपनी तुलना उन सहपाठियों से करती थी जो मेरे आकलन में गुणी और योग्य थे।


मैं इस बात से त्रस्त थी कि अपनी भावनाओं के प्रभाव से मैं एक दिन फट जाऊँगी। बिना किसी उकसाव के चिल्लाना मेरा आम व्यवहार था। मुझे सम्भालने के लिए मेरे अभिभावक मुझे बेरहमी से मारते थे। लेकिन मुझे यह नहीं लगा कि वो गलत थे। मेरा विसंगतिपूर्ण व्यवहार उनके गौरव पर एक धब्बा था। मैं यह नहीं समझ पा रही थी कि मैं ऐसा व्यवहार क्यों कर रही थी।


एक प्रतिष्ठित संस्थान में प्रबंधन पढ़ने का मौका मिलने के बावजूद मैं अपने को बेकार समझती थी। मेरे डाक्टर बनने का जो सपना पापा देखते थे उसे पूरा न कर पाने का अपराधबोध मुझे अंदर से कुरेद रहा था।


A21 साल की आयु में मेरी शादी उस लड़के से हो गयी जिसे मेरे पापा ने मेरे लिए पसंद किया था। मैं बिल्कुल टूट गई क्योंकि मन ही मन कालेज के जिस लड़के को मैं पसंद करती थी यह बात मैं उसे बोल नहीं पाई। मैंने कभी अपने आप को उसके प्यार के लायक नहीं समझा, हालांकि उसे मुझमें काफ़ी दिलचस्पी थी। वह मेरे असामान्य शांत स्वभाव को लेकर उत्सुक था। मुझे लगा मैं उसके प्यार के काबिल नहीं हूँ।


रिश्तों को कायम रखना मेरे लिए एक चुनौती थी। मैं यह नहीं समझ पायी कि मेरी मानसिक समस्याएं मेरे वैवाहिक जीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन शायद ब्रम्हांड को मेरे उपर दया आयी थी। मेरी खुशकिस्मती थी कि मेरी शादी एक नम्र और समझदार इन्सान से हुई, जिसमें धैर्य था और मेरे लिए समानुभूति थी।


पर मेरे ससुरालवाले मुझे हमेशा ताना मारते रहते थे, और मैं फिर से अवसाद की चपेट में आ गई। 7 सालों में मैंने तीन बार आत्महत्या करने की कोशिश की, और थेरपी और दवाओं के साथ मेरा लम्बा इलाज चला। चिकित्सकों ने बताया कि मुझे अवसाद और द्विध्रुवी विकार है। मेरे पति ने इस संघर्ष में मेरा पूरी तरह से साथ निभाया। आधी रात को वह मुझे आपातकालीन वार्ड में लेकर भागते। पूरी रात वह जागते रहते यह सुनिश्चित करने के लिए कि मैं ठीक हूँ, क्योंकि मैंने कई बार अपनी जान लेने की कोशिश की थी।


महीने में ऐसे कई दिन होते हैं जब मैं बिस्तर पर पड़ी सिसकती रहती हूँ, सोई रहना चाहती हूँ। अपनी दवाईयाँ लेती हूँ और बिस्तर से उठना नहीं चाहती हूँ। लेकिन मुझे अभी भी आशा है कि वो दिन अवश्य आयेंगे जब सब कुछ उज्जवल और खुशनुमा होगा। अब तक मैंने एक अधूरी जिंदगी जी है, लेकिन मेरा यकीन है कि सब कुछ ठीक हो जायेगा और इन काले बादलों के पीछे छिपे सूरज का उजियारा फिर से फैलेगा।


“महिनों तक मैं हर रात रोते रोते सो जाती और सुबह मेरी आँखें सूज जाती। रजाई के नीचे मैंने अपना घर बना लिया था।”
ऋतिका तनाव और व्यग्रता के साथ आपने संघर्ष की कहानी बता रहीं हैं और किस तरह से वैकल्पिक थेरपी से वह इससे उबर पाईं।

मैं कॉलेज में पढ़ने वाली एक हंसमुख छात्रा थी और अपने परिवार से दूर अकेली रहती थी। मुझे दोस्तों के साथ घुमना फिरना बहुत पसंद था और मैं बहुत खुश थी। लेकिन अचानक जीवन में एक अप्रत्याशित मोड़ आया। कुछ सही नहीं लग रहा था, मेरे अंदर की चिंगारी कहीं खो गई थी। महिनों तक मैं हर रात रोते रोते सो जाती और सुबह मेरी आँखें सूज जाती। रजाई के नीचे मैंने अपना घर बना लिया था। मैं तनाव और व्यग्रता से जुझ रही थी। पता नहीं क्यों पर मैंने अपना लचीलापन खो दिया था। खुशी से मैं डरने लगी थी। मैंने उदासी को अपना लिया। हर छोटी बात पर मैं रोने लगती। इसके चलते मेरी खुराक और मेरा वज़न भी कम हो गया। मैं शारीरिक रूप से कमज़ोर हो गई।


सबसे बुरा अहसास होता है जब सब ठीक लगता है पर आप अच्छा महसूस नहीं करते हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं ऐसा क्यों महसूस कर रही थी। 8 महिनों तक संघर्ष करने के बाद मैंने अपने डर का सामना करने और मदद माँगने की ठान ली। अपने अनुभवों के बारे में मैंने अपने माता पिता को बताया। स्वस्थता की तरफ वह मेरा पहला कदम था। साथ ही वैकल्पिक पद्धतियों, जैसे योग और नृत्य ने बहुत ज्यादा मदद की। थेरपी की वजह से आज मैं एक बेहतर जगह पर हूँ। खोई हुई उस चिंगारी को अभी भी ढूँढ रही हूँ और उम्मीद करती हूँ कि, बहुत जल्द, फिर से खुश हो पाउंगी।


“आपको अपने आशीर्वादों की अभिव्यक्तियों में निरंतर भाग लेना होगा।”
- एलिजाबेथ गिल्ब


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