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आरोग्य की कहानियां

ऐसे लोगों से मिलें जिन्होंने अपनी कहानियां साझा की हैं – अनेक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से उबरने वाले जीवन के वास्तविक अनुभव जानें। सुनें कि किस प्रकार उन्होंने हार नहीं मानी, उनके संघर्षों को देखें और उनकी सफलता के बारे में पढ़ें।

इस परिस्थिति से उबरना संभव है, जरूरत है तो थोड़ी सी इच्छाशक्ति, और थोड़े मदद की। इसके लिए आपको सारी आवश्यक प्रेरणा यहां मिल सकती है। उन लोगों के वास्तविक जीवन का वर्णन देखें जो विभिन्न प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों से उबर पाएं हैं और आरोग्य लाभ की प्रेरक कहानियां पढ़ें।
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14 दिसंबर 2017
अवसाद की डायरी
अवसाद या व्यग्रता के अचानक सामने आने पर जिंदगी एक समान नही रह जाती है। यह जीवन का रूख़ बदल देता है और व्यक्ति भावनात्मक भंवर में फँस जाता है।
हाय, मेरा नाम नंदिता सिंह है, और यह मेरी बिखरी-बिखरी सी कहानी है। स्कूल में, घर में, और अब कॉलेज में बिताए मेरे जीवन के कुछ टूटे फूटे ब्यौरे, मेरे दिल की उलझन बताने की कोशिश करते हैं। मैं बस इतना चाहती हूं कि जब कभी भी आपको ऐसा लगे कि पूरी दुनिया आपको निगल जाना चाहती है, तो सदैव यह बात याद रखें कि आप कभी भी अकेले नहीं हैं और न ही होंगे।
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“2013 में मेरे बच्चे के जन्म के बाद, मेरा प्रसवोत्तर अवसाद का निदान किया गया था।”
पार्वती अनूप

2013 में मेरे बच्चे के जन्म के बाद, मेरा प्रसवोत्तर अवसाद का निदान किया गया था। अक्सर रोना, ये भावना कि मेरे बच्चे को मुझसे छीन लिया जायेगा और पेट में आग का एहसास मेरी इस बीमारी के कुछ लक्षण थे। और फिर, एक ऐसा समय भी आया जब मैं अपने एक महीने से भी कम उम्र के बच्चे को स्तनपान भी नहीं करा सकी। मेरी गयनेकोलॉजिस्ट ने बताया की मुझे अवसाद की बीमारी है और मुझे एक अच्छे मनोचिकित्सक के पास भेज दिया। मेरा बेटा अब लगभग पांच साल का हो गया है और मुझे दवाइयाँ बंद किये सिर्फ 2 महीने हुए हैं। मुझे खुशी है कि मुझे मदद मिली क्योंकि मैं अपने बच्चे की परवरिश कर पायी जिससे मुझे बेहद ख़ुशी मिली हैं। प्रसवोत्तर अवसाद अक्सर पकड़ में नहीं आता और एक माँ को बेवजह ये बीमारी भुगतनी पड़ती हैं। मैं चाहती हूँ कि हर माँ यह जाने की दवा, योग और व्यायाम से आप इस बीमारी से उभर सकते हो और एक सामान्य जीवन जी सकते हो।


“ये 2004 की बात है जब मेरा होटल प्रबंधन में दाखिला हुआ था।”
रमन महल

ये 2004 की बात है जब मेरा होटल प्रबंधन में दाखिला हुआ था। मैं एक अच्छे परिवार से हूँ, हालांकि मेरा किसी मेट्रो शहर की जिंदगी का कोई अनुभव नहीं रहा है। परिवार में सबसे छोटी लड़की होने के कारण मुझे बहुत ज्यादा लाड़-प्यार दिया गया था। शहर की तेज रफ़्तार वाली ज़िन्दगी में मुझे अकेलापन महसूस होने लगा। गाँव से होने के कारण मेरा मजाक उड़ाया जाता था। मेरे रूप-रंग और बनावट का मजाक उड़ाया जाता था। धीरे-धीरे मेरा खाना छूटने लगा और आत्महत्या का ख्याल मन में आने लगा। मैंने अपने परिवार को मेरे हालात समझाने की कोशिश की पर वे नहीं चाहते थे कि मैं वापस लौट कर आऊं। आखिर में, मेरे दादाजी को मेरी चिंता होने लगी। मैंने चंडीगढ़ में एक कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन वहां भी मैं उसी दुष्चक्र में फस गयी। फिर मैंने अपने पापा को फोन किया और उन्होंने एक डॉक्टर से सलाह लेने का फैसला किया। निदान से पता चला कि मैं अवसाद और ओसीडी से पीड़ित हूँ।


दवा और सीबीटी से मेरी हालात में काफी सुधर आया है और अब मैं एक कॉलेज में प्रोफेसर हूँ। मेरा दवाइयाँ लेना कम हो गया है और मेरा काम मुझे ज्यादातर समय व्यस्त रखता है, जो कि इस बीमारी का सटीक इलाज है। जब आप व्यस्त होते हैं तो अनचाहे ख्याल नहीं आते। अंत में, मैं यही कहना चाहूंगी कि अवसाद से शर्मिंदा होने जैसा कुछ नहीं है। अपने आप को व्यस्त रखें।

“मेरा नाम प्रीती है और मैं बीसीए के तीसरे साल में हूँ। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद मुझे अच्छा महसूस नहीं होता था क्यूंकि मेरे लिए कॉलेज का अनुभव नया था।”
प्रीती

मेरा नाम प्रीती है और मैं बीसीए के तीसरे साल में हूँ। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद मुझे अच्छा महसूस नहीं होता था क्यूंकि मेरे लिए कॉलेज का अनुभव नया था। कॉलेज में दाखिल होने के 6 महीनों में ही मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। कोई भी मेरी मदद नहीं कर रहा था क्यूंकि जिसको भी मैं मेरी हालत के बारे में बताती वो यही कहता कि ये तनाव है और मुझे बस सोना चाहिए, या गाने सुनने चाहिए, या वो सब करना चाहिए जिससे मुझे ख़ुशी मिलती हो। पर, मैं इनमे से कुछ भी नहीं कर पायी और ऐसा 6 महीनों तक चलता रहा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। और फिर एक दिन मुझे पता चला कि मैं नैदानिक ​​अवसाद से गुज़र रही थी।


मैं शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर थी। एक दिन मैं यूहीं बैठी हुई थी और किसी गहरी सोच में डूबी थी। जैसे ही मेरी माँ ने मुझसे पूछा कि मैं क्या कर रही हूँ, मैं टूट पड़ी, और वही शुरुआत थी। यहां तक ​​की मेरे माँ-पापा भी मेरी हालत को समझ नहीं पाए। मेरे पापा ने कहा की मेरे साथ जो हो रहा है वो मेरी सोच का नतीजा है। उन्होंने कहा की अगर तुम सोचोगे कि तुम ठीक हो, तो ठीक महसूस करोगे। एक महीने बाद उन्होंने मुझे एक मनोचिकित्सक को दिखाने का फैसला किया। मेरी दवाइयाँ चल रही है। मैं पहले से बेहतर महसूस कर रही हूँ। और, अब मैं शर्मिंदा नहीं हूँ।

“मैं काजोल आइकत हूँ, एक 24 वर्षीय लेखक। जब मैं 1.5 साल की थी, तब मेरा मिर्गी का निदान हुआ था।”
काजोल आइकत

मैं काजोल आइकत हूँ, एक 24 वर्षीय लेखक। जब मैं 1.5 साल की थी, तब मेरा मिर्गी का निदान हुआ था। पर आश्चर्य की बात ये है कि, ये एक काले सिक्के का उज्ज्वल हिस्सा था। एक रोज, जब मैं हाईस्कूल में हुआ करती थी, उस सिक्के का दूसरा पहलु मेरे सामने आया। मुझे दोपहर में अचानक दौरा आ गया और उस दिन के बाद मेरा मजाक उड़ाया जाने लगा और मुझ पर धौंस जमाई जाने लगी। एक ऐसा समय भी आया जब बड़ी कक्षा के कुछ छात्रों ने मिलकर मेरे साथ छेड़छाड़ की। इस घटना का मेरी बाकी की जिंदगी पर गहरा असर पड़ा। मैं सोचने लगी की शायद मुझमे ही कोई कमी है और इन दौरों के लिए मैं खुद जिम्मेदार हूँ।


मैं पहले से ही नसों की दवाओं पर थी। मैं एक ऐसे दौर से भी गुजरी जब मैं पुरे वक़्त घर पर बैठी रहती थी और मुझे अपने माँ-पापा से भी बात करने में डर लगता था। सब लोग और सबकुछ मेरे लिए अंधेरे से भर चुका था। और फिर एक दिन मुझे महसूस हुआ कि शायद मैं इस मुद्दे को जरुरत से ज्यादा मूल्य दे रही हूँ और मुझे इससे बेहतर होने का हक़ है। आज मैंने 4 राष्ट्रीय बेस्टसेलर किताबें लिखी हैं, नौकरी कर रही हूँ और मेरे परिवार का ध्यान रख रही हूँ। मेरे पास ऐसे दोस्त हैं जो मुझे सहज महसूस कराते हैं और अब मैं सिर्फ अपने लिए ख़ुशी ढूंढती हूँ।

“मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक मेडिकल छात्रा होते हुए मुझे किसी मानसिक बीमारी से गुजरना पड़ेगा। पर ज़िन्दगी में कब क्या हो जाये, आप सोच भी नहीं सकते।”
डॉ के

मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक मेडिकल छात्रा होते हुए मुझे किसी मानसिक बीमारी से गुजरना पड़ेगा। पर ज़िन्दगी में कब क्या हो जाये, आप सोच भी नहीं सकते। एमबीबीएस पूरी होने के बाद, मैं उन दिनों ग्रामीण सेवा में व्यस्त थी। तभी मेरा संक्षिप्त साइकोसिस का निदान हुआ। दूर बसे एक छोटे से गाँव में एक ऐसे परिवार के साथ रहने के बाद, जिसने अपना एक जवान बेटा खोया था, मैं हेलुसिनेट करने लगी और ये कल्पना करने लगी कि टीवी पर मेरी चर्चा की जा रही हैं। मुझे याद है कि मेरा तत्कालीन प्रेमी मुझे वापस वास्तविकता में खींचने की कोशिश करता रहा। लेकिन शुक्र है कि दवा ने अपना असर दिखाया। हर साल मैं गहरे अवसाद से गुजरती थी। मेरे करीबी और प्रियजनों तक को मैं कड़वी बातें कह दिया करती थी। इन्ही सब के दौरान, व्यक्तिगत मुश्किलों से गुजरने के बाद एक मनोचिकित्सक ने मेरा गलत निदान किया और बताया कि मुझे असल में स्किज़ोफ्रेनिया हैं। उनके साथ मैंने काफी तर्क भी किया। अगले ही दिन मैं निमहंस के लिए निकल पड़ी। उन्होंने कहा कि मैं पूरी तरह से ठीक हूँ। मुझे सिर्फ परामर्श सत्रों के लिए एक मनोवैज्ञानिक से मिलने को कहा गया। पोस्ट ग्रेजुएशन के अकादमिक दबाव के कारण मैं फिर से अवसाद में डूब गयी। किसी पास ही के मनोचिकित्सक को दिखाने से पता चला कि मुझे द्विध्रुवीय विकार हैं। छह महीने तक मैं मूड स्टेबलाइजर्स लेती रही और इस दौरान मेरा करीब दस किलो वजन बढ़ गया।


कोई फायदा नहीं हुआ। एमडी की फाइनल परीक्षा के कुछ ही समय पहले एक और झटके से ठीक पहले मेरे बेहद सहायक प्रोफेसर ने मुझे घर जाने की इज़ाज़त दी। किसी भी तरह पोस्ट-ग्रेजुएशन के पिछले तीन साल की अवधि में मेरे योग्य प्रदर्शन के कारण मैं परीक्षा में सफल हुयी। परीक्षा पूरी होने के बाद मैंने पूरी तरह से दवाइयां छोड़ दी। अब मैं एक नयी जगह पर काम करती हूँ। अपनी जीवन शैली में भी मैंने कई बदलाव लाये हैं। व्यायामशाला में नियमित व्यायाम करती हूँ, अच्छा खाना खाती हूँ, और अकेले रहने में आज़ाद महसूस करती हूँ। शायद थोड़ा बदलाव और समर्थन काफी आगे तक जाता हैं। कृपया सचेत रहें और जिन्हे मदद की जरुरत हैं, उनकी जरूर मदद करें। सही निदान करवाएं और खुद को संभालें। अगर मैं कर सकती हूँ, तो आप भी कर सकते हैं।

“उस रोज मैं विदेश में काम किया करता था। मुझे समझ भी नहीं आया की मेरे साथ क्या हो रहा था या क्या था जो मेरे अवसाद का कारण बन गया था।”
गुमनाम

उस रोज मैं विदेश में काम किया करता था। मुझे समझ भी नहीं आया की मेरे साथ क्या हो रहा था या क्या था जो मेरे अवसाद का कारण बन गया था। मुझे सिर्फ इतना पता था कि मैं हर समय थका-थका सा रहता था पर फिर भी नींद नहीं आती थी। मैं अपने काम पर ध्यान नहीं दे पाता था। कभी ऐसे पल आते थे जब मैं अचानक रोने लग जाता और चुप नहीं हो पता था। न बाहर जाता था, न किसी से मिलता था। मैं अपने कमरे की बत्तियां भी नहीं जगाता था, शायद मैं खुद को शीशे में देखने से डरता था। मेरे आस-पास सब कुछ मानो थम सा गया हो। लोग मेरे घर आते थे और मैं उन्हें बाहर से ही रवाना कर देता था। यहाँ तक की उन्हें अंदर आने को भी नहीं कहता था। तब मेरे किसी करीबी ने ज़िद्द करके मुझे मदद के लिए आगे बढ़ने को कहा। मुझे आज भी मेरी थेरेपी का पहला सत्र याद है। मेरी किसी भी हरकत का कोई मतलब नहीं निकल रहा था, मैं बेहिसाब रोये जा रहा था और एक पूरा वाक्य तक नहीं बना पा रहा था। लेकिन उन सत्रों में मदद मिली। किसी तरह से मुझे एक अजनबी से बात करना अच्छा लगने लगा था, शायद इसलिए की मुझ पर अपनी किसी भी बात को तार्किक रूप से समझाने का दबाव नहीं था। मैं अभी भी अपने दोस्त का आभारी हूं, जिसने मुझे जबरदस्ती थेरेपी के लिए भेजा।


ठीक न महसूस करना बिलकुल ठीक हैं। हम सभी इंसान हैं। कुछ दिन हम उल्लास से भरे होंगे, कुछ दिन हम सुस्त होंगे। पर अगर आप सिर्फ सुस्त रहते हैं, तो मेरे हिसाब से वही अवसाद हैं। मैं अपने सभी दोस्तों को मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करता हूं। हमारे देश में यह अभी भी एक वर्जित मुद्दा है। लेकिन समाज को अनदेखा करें। आपको बुखार है, आप डॉक्टर के पास जाते हैं। अगर आप को अवसाद महसूस हो रहा हैं, तो आप इसके लिए भी इलाज के लिए जाएँ।

“जब आपको आपकी सेहत की हालत के बारे में पता चलता है तो इससे तकलीफ पहुँचती हैं और जैसे अचानक ही आपकी पूरी दुनिया बिखर सी जाती हैं।”
सानीया जैक्सन

जब आपको आपकी सेहत की हालत के बारे में पता चलता है तो इससे तकलीफ पहुँचती हैं और जैसे अचानक ही आपकी पूरी दुनिया बिखर सी जाती हैं। 2013 में, 19 साल की उम्र में, मेरा थैलेसेमिया का निदान किया गया था। थैलेसेमिया एक आनुवांशिक स्थिति हैं। तब मैं एक मनोविज्ञान की छात्रा हुआ करती थी और गाने गाना मेरा जुनून था। इस भयावह स्थिति ने मुझे अचानक ही अवसाद के महासागर में डूबो दिया था और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे सपने देखने चाहिए या नहीं?


मैंने सब कुछ छोड़ दिया। ज्यादातर समय मैं घर में रह कर रोती थी और मदद के लिए चिल्लाया करती थी। कभी-कभी मुझे अपने जीवन को खत्म करने की इच्छा होती और ऐसा जान पड़ता जैसे मेरे शरीर के अंदर कुछ हैं जो ख़त्म हो रहा हैं। तब एक दिन मेरी माँ ने मुझे जीबी पंत अस्पताल की मनोविज्ञानी काउंसलर डॉ। आक्रुति को दिखाया। उन्होंने लगभग 2 महीने तक नियमित रूप से इलाज किया। दवा और देखभाल से मैं अवसाद से उभर गयी। मुझे अपनी कहानी को साझा करने में कोई शर्मिंदगी नहीं हैं, ताकि उन लोगों की आँखें खुल सके जो अपनी कहानी साझा करने में डरते है। अब मैं खुल कर जीती हूँ और मुझे कोई परवाह नहीं हैं कि मुझे थैलेसेमिया हैं क्योंकि कुछ भी हमें अपने सपने देखने और अपने लक्ष्य का पीछा करने से रोक नहीं सकता है। वर्तमान में मैं मनोविज्ञान में स्नातक हूं और अपने पहले संगीत एल्बम पर काम कर रही हूँ।

“मैं 21 वर्षीय द्विध्रुवीय हूँ। अवसाद की 3 घटना और उन्माद की 2 घटना से गुज़रने के बाद 2015 (4 साल पहले) में मेरे मैनिक अवसाद का निदान किया गया।”
गुमनाम

मैं 21 वर्षीय द्विध्रुवीय हूँ। अवसाद की 3 घटना और उन्माद की 2 घटना से गुज़रने के बाद 2015 (4 साल पहले) में मेरे मैनिक अवसाद का निदान किया गया। मुझे लगता है कि जागरूकता की कमी के कारण मेरे निदान में देरी हो गयी और इसलिए मैं अपनी कहानी साझा करना चाहता हूं। दवा शुरू करने के बाद भी मुझे अवसादग्रस्त प्रवृत्तियों के साथ संघर्ष करना पड़ा। मुझे लगता है कि मेरी दवा शुरू होने के बाद भी, जागरूकता की कमी के कारण परामर्श और आवश्यक चिकित्सा प्राप्त नहीं हुई थी। मुझे लगता है कि दवा और जीवनशैली को बनाये रखना जरुरी हैं पर काफी नहीं हैं। थेरेपी आवश्यक है। अब मैं थेरेपी के सत्रों में जाता हूँ, लेकिन फिर भी मैं कभी-कभी अटक सा जाता हूँ और उदास महसूस करता हूं। मानो की जिंदगी अंधेरमय और स्थिर हो गयी है। और जैसे यह कभी नहीं बदलेगा। निराशाजनकता कई बार आत्महत्या के चिंतन की ओर ले जाती है क्योंकि मरना जीने से आसान लगने लगता है। ये भावना इतनी भारी और सशक्त थी कि कुछ भी मुझे खुश नहीं कर पा रहा था। और सबसे बुरी बात यह थी कि मुझे ऐसा लगने लगा था कि कोई भी मुझे समझ नहीं पाएगा।


ऐसा नहीं था कि मैंने कोशिश नहीं की। कोशिश तो मैंने की थी लेकिन जागरूकता और समझ की कमी के कारण मुझे सिर्फ नकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिलती या छोटा दिखाया जाता था। मैंने अपनी हालत को खुद तक सिमित रखना शुरू कर दिया जिससे हालात और ख़राब हो गए। मैं अकेला महसूस करने लगा और ऐसा लगने लगा की मैं कहीं के भी लिए फीट नहीं हूँ। मेरा आत्म सम्मान बिलकुल गिर चुका था। मुझे ऐसा लगने लगा कि सब मेरा मजाक उड़ा रहें हैं या मुझ पर हंस रहे हैं। मैं कहीं छिप जाना चाहता था या अदृश्य होना चाहता था। संगीत और लेखन ने ही मुझे चलाये रखा था। मुझे उन गानों को सुनना अच्छा लगता था जिसे मैं अपने कमजोर पलों से जोड़ पाता था। मैं उन लोगों को चुनने की कोशिश करने लगा जो एक साफ़ स्लेट की तरह थे ताकि वो मेरे बारे में कोई धारणा न बनाये। उनसे मेरी बातें साझा करके या उनकी मदद करके मुझे उपलब्धि की भावना मिलती थी जिससे मैं थोड़ा उभर पाता था।


धीरे-धीरे मुझे समझ में आया कि मुझे मेरी बीमारी की जड़ों को ढूंढना जरुरी था, वो जड़ें जो मेरे बचपन में समाहित थी, और उनका हल करना था। यही वह समय था जब मैंने इमोशनली एब्सेंट मदर और रनिंग ऑन एम्प्टी (जोनिस वेब) जैसी स्वयं सहायता किताबों के साथ स्वयं पर काम करना शुरू कर दिया। मैंने समय-समय पर थेरेपी सत्र में जाना शुरू कर दिया। मैं अभी भी संघर्ष करता हूं लेकिन इससे बाहर निकल पाने से मैं सशक्त महसूस करता हूँ और मैं वास्तव में इस पहल से प्रेरित हूँ। मैं हर संभव तरीके से #notashamed आंदोलन में भाग लेना चाहता हूँ। भारत को भावनात्मक रूप से शिक्षित और साक्षर बनाने का यही एकमात्र तरीका है।

“चोटों से क्षय हुए, हम वो चमकते सितारे है।”
भाविक पाठक

चोटों से क्षय हुए, हम वो चमकते सितारे है।


अवसाद से लड़ते हुए मुझे 3 साल से ऊपर हो गया हैं। किसी तरह मैं ये नाटक अच्छी तरह कर पाता हूँ कि मैं ठीक हूँ लेकिन मुझे पता है कि वो अँधेरे से भरे विचार किसी भी वक़्त हमला कर सकते है। मुझे पता है कि कब खुद को अराजकता के चक्र में डालना हैं और कब उससे बाहर निकलना हैं। हार मान लेने के हजारों कारण हैं पर फिर भी मैं ऐसा नहीं करना चाहता क्यूंकि मुझे जानना हैं कि दूसरी तरफ क्या हैं। ये भी सच हैं कि अगर अँधेरे ने आपको एक बार छू लिया तो यह वास्तव में आपका साथ कभी नहीं छोड़ता। पर हम मनुष्य कुछ भी हासिल कर सकते है। मैंने हमेशा मूल परिप्रेक्ष्य को बदलकर अवसाद को एक सकारात्मक आकार देने की कोशिश की है।


यादें ले चलें और दर्द को छोड़ते जाएँ ।।एक अनन्त शांति की ओर

“किसी को नहीं पता कि मस्तिष्क वैसे क्यों काम करता है जैसे वह करता है।”
गुमनाम

मुझे प्रसवोत्तर अवसाद था। मैं चिकित्सा में स्नातकोत्तर के दूसरे साल में थी जब मैं गर्भवती हुई। एक तनावपूर्ण गर्भावस्था और एक लम्बी प्रसव-वेदना के बाद मैंने एक सुन्दर से बच्चे को जन्म दिया। बच्चे होने के बाद मैं अपनी माँ के घर चली गयी, मातृत्व का आनंद लेने। कुछ दिन अच्छी तरह से निकल गये, हाँ, बच्चे को खिलाना-पिलाना ओर उसका ध्यान रखना चलता रहा। दूसरे महीने में, मेरे पति दो सप्ताह के लिए हमारे पास रहने आ गए ओर सब ठीक चल रहा था। उस रात वह अपने कार्यस्थल पर वापस लौट गया और मैं सोशल मीडिया पर हमारे बच्चे की तस्वीरें अपलोड कर रही थी।


अचानक, मुझे उत्कंठा और डर महसूस होने लगा, मैं समझ नहीं पायी कि ऐसा क्यों हो रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था कि अगर मैं सो गयी तो मुझे डूबने या दम घुटने का सपना आएगा। या अगर मैं सो गयी तो मैं वापिस जाग नहीं पाऊँगी और कोमा में चली जाऊँगी। मुझे पता था कि यह एक बेतुका और तर्कहीन विचार था, लेकिन मेरा दिमाग उस विचार पर प्रतिक्रिया कर रहा था और उसी रात मुझे एक घबराहट का दौरा आया। किसी तरह मैंने खुद को सोने के लिए आश्वस्त किया। अगले दिन जब मेरी आँख खुली, तब मैं उदासी की भावना के साथ उठी। यह एक बेवजह सी उदासी की एक मोटी परत जैसी लग रही थी और साथ ही नींद का डर मुझे खाये जा रहा था। अगले दो महीने मेरी ज़िंदगी का सबसे बुरा वक़्त था।


मुझे ऐसे विचार आते थे कि मैं एक अच्छी माँ नहीं थी या शायद मुझे डर था कि मेरा करियर खत्म हो गया है। इसके प्रति मेरे पति के दृष्टिकोण से कोई मदद नहीं मिल रही थी। मुझे इसका निदान पता था लेकिन इसे स्वीकार नहीं कर पा रही थी। मैं एक मनोचिकित्सक से दूसरे मनोचिकित्सक के पास भागती रही पर मुझे तब भी यकीं नहीं हुआ कि मुझे प्रसवोत्तर अवसाद था। लेकिन फिर, अंत में, मेरे माता-पिता के मानाने पर और मेरे पति के समर्थन से मैंने एंटीड्रिप्रेसेंट दवाइयां लेने का फैसला किया।


मैंने तीन महीने तक इन दवाईयों को लिया और फिर इन्हे कम कर दिया। सौभाग्य से ये दौर मेरे लिए, खत्म हो गया।


“मैं दो बेटियों की अकेली मां हूँ।”
श्रीदा

मैं दो बेटियों की अकेली मां हूँ। मेरी दूसरी बेटी के होने के बाद, मेरा प्रसवोत्तर अवसाद का निदान हुआ, जो दुर्भाग्य से ठीक नहीं हुआ क्योंकि मेरे परिवार ने कभी मेरा समर्थन नहीं किया था। उन्होंने मेरी हालत कभी नहीं समझी और मुझे नकारात्मक विचार रखने और लगातार रोने के लिए दोषी ठहराते रहे। दुर्भाग्यवश, मेरी हालत गंभीर हो गई और गहन आत्मघाती विचारों के साथ प्रमुख नैदानिक ​​अवसाद में बदल गयी।


मुझे अपनी बेटियों के लिए जीना था, इसलिए किसी भी तरह मैंने खुद को मनोचिकित्सक को दिखाया और फिर दवाईयों की शुरुआत हुई। अपनी बेटियों को लेकर, मैं अपने पति के घर को छोड़ आयी, ताकि मैं एक सकारात्मक माहौल में ठीक हो सकूँ। 9 महीनों के अंदर, मुझे दवाईयों से मुक्ती मिल गयी। मुझे खुशी है कि मैं बच गयी। लेकिन मेरी पारिवारिक स्थिति अभी भी वही है। मैं शिक्षा उद्योग में एक बहुत सफल व्यक्ति हूं लेकिन आज भी अकेली हूँ और मेरे माता-पिता से कोई समर्थन नहीं है। कभी-कभी वो भावना वापस आती है लेकिन अब मैं इसे संभालना सिख चुकी हैं।


“मैं 16 साल की हूँ। मुझे नहीं पता था की अवसाद दिखने में कैसा होता हैं, पर मेरी माँ इसका सामना कर रही थी।”
रिफ्का लाइटवाला

मैं 16 साल की हूँ। मुझे नहीं पता था की अवसाद दिखने में कैसा होता हैं, पर मेरी माँ इसका सामना कर रही थी। मैं खुद घबराहट और उत्कंठा के दौरों से गुजर रही थी, जो मुझे 21 साल की होने पर ही समझ आया। मैं एक मोटी बच्ची थी, मुझे खुद पर कोई विश्वास नहीं था और मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं भी सुंदर दिख सकता हूँ। हर रात मुझे खुद के बारे में और बुरा लगता, खुद को रात के 3 बजे देखकर रोती थी। ऐसी एक रात मैंने अपने आहार को नियंत्रित करने का सोचा और प्रगति से मैं सुंदरता की तरफ तो बढ़ रही थी, पर मैं अपने आप को अंदर ही अंदर दुःख दे रही थी। धीरे-धीरे परिणामों की तलाश में, मैंने व्यायाम करना शुरू कर दिया और अगले तीन वर्षों तक खुद को फिटनेस गतिविधियों में शामिल करती रही।


अब, 2018 में जब मुझे खुद पर विश्वास होने लगा, पोषण के बारे में समझ आयी, तब नियंत्रित आहार के कारण मैं ट्यूबरक्लोसिस से पीड़ित हो गयी। यह मेरे जीवन में एक प्रमुख मोड़ था। बाहरी सौंदर्य और परिवार के द्वारा शर्मिंदा किये जाने पे मुझे अपनी ज़िन्दगी की एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। शायद, मैं एक व्यक्ति के रूप में विकसित हुई हूँ, लेकिन यह सब मेरे स्वास्थ्य की कीमत पर था। मैंने कभी भी अपने घबराहट के दौरे, उत्कंठा या असुरक्षा के बारे में किसी से बात नहीं की हैं। लेकिन आज मैं जो हूँ, और जैसी दिखती हूँ, मुझे खुद पर विश्वास है।


“मुझे लगता है कि मेरी कहानी तब शुरू हुई जब मैं चौदह साल की थी।”
गुमनाम

मुझे लगता है कि मेरी कहानी तब शुरू हुई जब मैं चौदह साल की थी। बिना किसी कारण के स्कूल असेंबली में अक्सर रो पड़ना, बहुत ज्यादा उत्कंठित महसूस करना, ये सब चलता रहा, लेकिन मैंने कभी भी कोई ध्यान नहीं दिया। अकादमिक रूप से मैंने कमियों को जरुरत से ज्यादा पूरी करने के लिए सब कुछ किया। अपने लक्ष्य को पाने के लिए काम में डूब गयी और अपने दम पर मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। खुद की आँखों में खुद के मूल्यों को मान्य करने के लिए, मैंने इसे एक रास्ते के रूप में पाया। मेरे आस-पास के सभी लोगों को उम्मीद थी कि मैं ठीक रहूँ, खुश और आभारी रहूँ। मैंने बाहरी दुनिया के सामने इन भावनाओं को दिखाने के लिए खुद को मजबूर किया।


मैं उठने और खाने तक के लिए संघर्ष करती, लोगों पर निर्भर हो गयी, हर वक़्त थकी-थकी सी रहती और कॉलेज जाने से नफरत सी हो गयी थी। अब जो भी मैं कर रही थी, मुझे उससे कोई ख़ुशी नहीं मिल रही थी। छह साल के बाद मैंने एक पेशेवर परामर्शदाता से सलाह लेने का फैसला किया और तब पता चला कि मैं जीएडी और सीमा रेखा अवसाद से पीड़ित हूँ। इसके अलावा, मेरे बचपन के आघात और दुर्व्यवहार का एक लम्बा इतिहास रहा हैं, और मुझे एहसास हुआ कि मुझे बुरे व्यवहार या अस्वीकार्य व्यवहार को सामान्य बनाने और समझने की आदत थी, इतना की मैं अपनी सीमाओं को खींचती रही बिना जाने की मेरी सीमाएं क्या थीं। इसका मेरे व्यक्तिगत संबंधों पर असर पड़ने लगा। मेरे आत्म-सम्मान को ठेस लगी और अब मैं प्यार के अयोग्य महसूस करने लगी।


मुझे अपनी भावनाओं को दबाने और उन्हें संबोधित न करने की इतनी आदत हो गयी थी, कि ये दूसरे तरीको से अभिव्यक्त होने लगे, जैसे गहन उत्कंठा के माध्यम से। कभी किसी को आपको ये न कहने दें कि आप एक बोझ है, क्यूंकि आपको बहुत बुरा लग सकता हैं। जो लोग वास्तव में आपसे प्यार करते हैं, वे आप जो है, उसके लिए आपको स्वीकारेंगे, और आप इससे थोड़ा भी कम पाने का हक़ नहीं रखते।

“मुझे एक क्षति का आभास हो रहा था; जैसे मैंने शरीर का कोई अंग खो दिया हो, लेकिन ऐसा नहीं था।”
एक महिला अपने गर्भपात और एक रिश्ते के टूटने के दर्दभरी कहानी बता रहीं हैं

जागने के बाद मुझे एक अजीब खालीपन ने घेर लिया। मेरे हाथ कांप रहे थे, मेरा मन भटक रहा था और मुझे बहुत ज़्यादा बेचैनी महसूस हो रही थी। मुझे एक क्षति का आभास हो रहा था; जैसे मैंने शरीर का कोई अंग खो दिया हो, लेकिन ऐसा नहीं था। अंधकारमय छोर मेरी ओर बढ़ रहा था और मैं आगे के जीवन के बारे में सोच नहीं पा रही थी। मैं अपने कम्प्यूटर स्क्रीन की तरफ एकटक देखती रहती, हर घड़ी को गिनती रहती, हर घड़ी एक पहर जैसा लगता था।


मुझे गर्भपात करवाना पड़ा था। उस समय जब मैं प्रसव के बारे में कुछ नहीं जानती थी, मुझे गर्भपात करवाने को कहा गया। और इसके लिए जो आदमी जिम्मेदार था वह अपनी सुविधानुसार चलता बना क्योंकि उसे लगा वह इस सदमे को झेलने के लिए बहुत छोटा था। इस शारीरिक और मानसिक पीड़ा से मुझे अकेले जुझना पड़ा। मुझे यह भी समझ नहीं आया कि मैं क्यों किसी ऐसे व्यक्ति के साथ रिश्ता खत्म हो जाने का मातम मना रहा थी जो इतना गैरजिम्मेदार था। गर्भपात के दूसरे दिन मैं मानसिक रूप से पूरी तरह से टूट गई। अगले दिन मुझे खालीपन, उदासी और शून्यता महसूस हुई। मुझे बताया गया था कि मुझे सिर्फ आठ मिनट के लिए बेहोश किया जायेगा और बाद में मुझे थोड़ी सी तकलीफ होगी। उन्होंने झुठ कहा था। इस घटना ने मेरे जीवन के अगले तीन सालों को बर्बाद कर दिया। जो इन्सान 6 सालों से मुझसे यह कह रहा था कि वह मुझसे प्यार करता है, वह रिश्ते में बंधने के डर से भाग खड़ा हुआ। मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या हुआ।


धीरे-धीरे मेरा आत्मसम्मान घटने लगा। मैं चिडचिडी, गुस्सैल और सामाजिक स्थितियों में बेअदब-सी रहने लगी। मुझे डरावने सपने आते और मैं देखती कि मेरे सामने मेरे बच्चे के टुकड़े किये जा रहे हैं। खुद को कमरे में बंद कर लेती और घण्टों रोती रहती। सोने जाती यह सोचकर कि अगली भोर न देखनी पड़े। मैं डरपोक नहीं थी लेकिन चाहती थी कि हर दर्द को अपने जीवन से हमेशा के लिए मिटा दूँ। अपराधबोध और शर्म के मारे अपनी कहानी मैं किसी के साथ साझा नहीं कर पा रही थी। जिस दिन मैंने यह तय कर लिया कि इस दर्द से मुझे छुटकारा चाहिए, मेरे मन के किसी कोने से उठी एक आवाज़ ने मुझे मदद माँगने को कहा। मैंने ऑनलाइन पढा और एक थेरेपीस्ट के पास गई बिना किसी उम्मीद के। मुझे विश्वास था कि कोई मेरी मदद नहीं कर सकता है। मैंने अपनेआप को एक कमरे में बैठा पाया और एक महिला मुझे मेरे जीवन और चयन को लेकर सवाल कर रही थी। मैं बैठी रही, लेकिन मैंने यह ठान लिया था कि किसी सवाल का जवाब नहीं दूँगी। वह धैर्यपूर्वक इंतज़ार करती रही। बिना कुछ बताए मैं उस दिन लौट आई लेकिन उस खामोशी ने मुझे मजबूर किया वापस जाने के लिए। दोबारा जब मैं उस थेरेपीस्ट से मिलने गई, मैंने अपने दिल में छुपे हर राज़ को बिना रोकटोक बाहर आने दिया। मुझे अब यह डर नहीं था कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे। यह मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला था। उन्होंने मेरी मदद की भविष्य के लिए वास्तविक उद्देश्य स्थिर करने में और अपनी भावनाओं को पहचानने और उनको सकारात्मक दिशा देने में। शुरू में मैं दवाई लेने से झिझक रही थी लेकिन धीरे-धीरे बेहतर महसूस करने लगी।


अब मैं एक अच्छी जगह पर हूँ और खुश हूँ कि मैंने अवसाद के साथ मुकाबला करना और उसके साथ चलना सिख लिया है।


“सैकड़ों लोगों के साथ खड़े रहना लेकिन फिर भी अकेला महसूस करना”
डॉ चार्वी अवसाद के साथ अपने संघर्ष की व्याख्या कर रहीं हैं

मैं डॉ चार्वी मुरारी हूँ और मैं एक दंत चिकित्सक हूँ। चार साल से अधिक समय तक मैंने अवसाद के साथ संघर्ष किया। सौभाग्य से, मेरे परिवार और दोस्तों ने इसपर जीत प्राप्त करने में मेरी मदद की और बहुत समर्थन दिया। मेरे संघर्ष की यह एक झलकी है (अंग्रेज़ी में लिखी कविता का भावार्थ):


समय खाली-सा लगता है
मेरी नज़र के सामने से बहता जाता है
और मैं खड़ी रहती हूँ, डरी सी
आगे क्या होने वाला है इससे अंजान
एक ऐसे भविष्य के लिए प्रार्थना करती हुई जब मैं निडर बनूँगी
स्वयं को मज़बूत बनाने की कोशिश करती हुई…
हर रात आख़िरी लगता है
सूरज मुर्झाया सा लगता है
एक गीत जो सुनाई देकर भी नहीं देता
उस बोझ के साथ सो रही हूँ जिसे और ढो नहीं पा रहीं हूँ
दर्द, क्षति, व्यथा… हाँ, यहीं है, अभी है!
लोग कहते है कि हार आपेक्षिक है
उन्हें क्या पता जब यह हावी होता है, सबसे ताकतवर बन जाता है
उत्साह खो देती हूँ दिल और आत्मा उड़ेलने की
जीवन की सम्भावनायें अपरिमित है लेकिन मुझे अपना लक्ष्य नहीं पता
हर दिन अपना मूल्य साबित करना पड़ता
जो दिखाना नहीं उसे छुपाना
हंसी को बनाएं रखना और आक्रोश को छुपाते रहना
अपने टुकड़ो को जोड़ते रहना यह जताने के लिए कि मैं टूटी नहीं हूँ
सैकड़ों लोगों के साथ खड़े रहना लेकिन फिर भी अकेला महसूस करना
मुझे पता है वे नहीं समझेंगे और ऐसा मैं चाहती भी नहीं
हर किसी को अपने बारे में समझा नहीं सकती, हर रोज़, हर बार
अब जब यह अकेलापन मेरा सहारा बन गया है, अंधेरा अलौकिक लगता है
लेकिन दिल के किसी कोने में यह पता है
एक भविष्य ऐसा भी होगा मेरा महिमामय और ओजस्वी
जैसे टूटें कांच के टुकड़े चमकते है पाक और उज्जवल सितारों से


“मैं यह नहीं समझ पा रही थी कि मैं ऐसा व्यवहार क्यों कर रही थी।”
कादम्बरी अवसाद और द्विध्रुवी विकार (बाइपोलर डिसऑर्डर) के साथ अपने 35 सालों के संघर्ष का वर्णन कर रहीं हैं।

बचपन से मैं बाइपोलर डिसऑर्डर, व्यग्रता, घबराहट और अवसाद से जुझ रही हूँ। यह मानसिक रोग पिछले 35 सालों से मेरे दुश्मन हैं। मुझे हमेशा लगता था कि मैं इन्हें पस्त कर दूँगी। पर उन्होंने भी मेरे खिलाफ काफी तगड़ी साजिश रची थी। लेकिन मैंने अपने अंदर हिम्मत बांध ली है और उम्मीद है कि जीवनभर मैं इससे जुझ पाऊँगी।


सिर्फ 10 साल की थी जब मैं कमरे के कोने में सहमी सी खड़ी थी, मार खाने के बाद कांप रही थी। मैंने घर के बड़ो की तरफ मदद के लिए देखा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे किस बात की सज़ा मिल रही थी। मुझे पता था कि मैं अपने माता-पिता को परेशान करती थी और अपने भाई–बहनों से अलग थी। अपने अद्भुत आचरण से दूसरों को चोट पहुँचाने का अपराधबोध मेरे अंदर था। लेकिन उन दिनों मानसिक रोगों के विषय में इतनी जागरुकता नहीं थी।


मंच पर अपने प्रदर्शन के दौरान मैं घबराई रहती और कांपती रहती। मैं आत्मविश्वासी और बहिर्मुखी थी, लेकिन धीरे-धीरे अंतर्मुखी और कम बोलने वाली लड़की बन गई। मुझे लगता था कि मैं दुनिया को जीत लूँगी, लेकिन जैसे-जैसे बड़ी होती गई मुझे लगने लगा कि मेरा स्तर साधारण से भी नीचे था। मैं अपनी तुलना उन सहपाठियों से करती थी जो मेरे आकलन में गुणी और योग्य थे।


मैं इस बात से त्रस्त थी कि अपनी भावनाओं के प्रभाव से मैं एक दिन फट जाऊँगी। बिना किसी उकसाव के चिल्लाना मेरा आम व्यवहार था। मुझे सम्भालने के लिए मेरे अभिभावक मुझे बेरहमी से मारते थे। लेकिन मुझे यह नहीं लगा कि वो गलत थे। मेरा विसंगतिपूर्ण व्यवहार उनके गौरव पर एक धब्बा था। मैं यह नहीं समझ पा रही थी कि मैं ऐसा व्यवहार क्यों कर रही थी।


एक प्रतिष्ठित संस्थान में प्रबंधन पढ़ने का मौका मिलने के बावजूद मैं अपने को बेकार समझती थी। मेरे डाक्टर बनने का जो सपना पापा देखते थे उसे पूरा न कर पाने का अपराधबोध मुझे अंदर से कुरेद रहा था।


A21 साल की आयु में मेरी शादी उस लड़के से हो गयी जिसे मेरे पापा ने मेरे लिए पसंद किया था। मैं बिल्कुल टूट गई क्योंकि मन ही मन कालेज के जिस लड़के को मैं पसंद करती थी यह बात मैं उसे बोल नहीं पाई। मैंने कभी अपने आप को उसके प्यार के लायक नहीं समझा, हालांकि उसे मुझमें काफ़ी दिलचस्पी थी। वह मेरे असामान्य शांत स्वभाव को लेकर उत्सुक था। मुझे लगा मैं उसके प्यार के काबिल नहीं हूँ।


रिश्तों को कायम रखना मेरे लिए एक चुनौती थी। मैं यह नहीं समझ पायी कि मेरी मानसिक समस्याएं मेरे वैवाहिक जीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन शायद ब्रम्हांड को मेरे उपर दया आयी थी। मेरी खुशकिस्मती थी कि मेरी शादी एक नम्र और समझदार इन्सान से हुई, जिसमें धैर्य था और मेरे लिए समानुभूति थी।


पर मेरे ससुरालवाले मुझे हमेशा ताना मारते रहते थे, और मैं फिर से अवसाद की चपेट में आ गई। 7 सालों में मैंने तीन बार आत्महत्या करने की कोशिश की, और थेरपी और दवाओं के साथ मेरा लम्बा इलाज चला। चिकित्सकों ने बताया कि मुझे अवसाद और द्विध्रुवी विकार है। मेरे पति ने इस संघर्ष में मेरा पूरी तरह से साथ निभाया। आधी रात को वह मुझे आपातकालीन वार्ड में लेकर भागते। पूरी रात वह जागते रहते यह सुनिश्चित करने के लिए कि मैं ठीक हूँ, क्योंकि मैंने कई बार अपनी जान लेने की कोशिश की थी।


महीने में ऐसे कई दिन होते हैं जब मैं बिस्तर पर पड़ी सिसकती रहती हूँ, सोई रहना चाहती हूँ। अपनी दवाईयाँ लेती हूँ और बिस्तर से उठना नहीं चाहती हूँ। लेकिन मुझे अभी भी आशा है कि वो दिन अवश्य आयेंगे जब सब कुछ उज्जवल और खुशनुमा होगा। अब तक मैंने एक अधूरी जिंदगी जी है, लेकिन मेरा यकीन है कि सब कुछ ठीक हो जायेगा और इन काले बादलों के पीछे छिपे सूरज का उजियारा फिर से फैलेगा।


“महिनों तक मैं हर रात रोते रोते सो जाती और सुबह मेरी आँखें सूज जाती। रजाई के नीचे मैंने अपना घर बना लिया था।”
ऋतिका तनाव और व्यग्रता के साथ आपने संघर्ष की कहानी बता रहीं हैं और किस तरह से वैकल्पिक थेरपी से वह इससे उबर पाईं।

मैं कॉलेज में पढ़ने वाली एक हंसमुख छात्रा थी और अपने परिवार से दूर अकेली रहती थी। मुझे दोस्तों के साथ घुमना फिरना बहुत पसंद था और मैं बहुत खुश थी। लेकिन अचानक जीवन में एक अप्रत्याशित मोड़ आया। कुछ सही नहीं लग रहा था, मेरे अंदर की चिंगारी कहीं खो गई थी। महिनों तक मैं हर रात रोते रोते सो जाती और सुबह मेरी आँखें सूज जाती। रजाई के नीचे मैंने अपना घर बना लिया था। मैं तनाव और व्यग्रता से जुझ रही थी। पता नहीं क्यों पर मैंने अपना लचीलापन खो दिया था। खुशी से मैं डरने लगी थी। मैंने उदासी को अपना लिया। हर छोटी बात पर मैं रोने लगती। इसके चलते मेरी खुराक और मेरा वज़न भी कम हो गया। मैं शारीरिक रूप से कमज़ोर हो गई।


सबसे बुरा अहसास होता है जब सब ठीक लगता है पर आप अच्छा महसूस नहीं करते हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं ऐसा क्यों महसूस कर रही थी। 8 महिनों तक संघर्ष करने के बाद मैंने अपने डर का सामना करने और मदद माँगने की ठान ली। अपने अनुभवों के बारे में मैंने अपने माता पिता को बताया। स्वस्थता की तरफ वह मेरा पहला कदम था। साथ ही वैकल्पिक पद्धतियों, जैसे योग और नृत्य ने बहुत ज्यादा मदद की। थेरपी की वजह से आज मैं एक बेहतर जगह पर हूँ। खोई हुई उस चिंगारी को अभी भी ढूँढ रही हूँ और उम्मीद करती हूँ कि, बहुत जल्द, फिर से खुश हो पाउंगी।


“आपको अपने आशीर्वादों की अभिव्यक्तियों में निरंतर भाग लेना होगा।”
- एलिजाबेथ गिल्ब


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