ग्रामीण कार्यक्रम

हर सात में से एक भारतीय को किसी प्रकार की मानसिक बीमारी का अनुभव होता है। मानसिक बीमारी, किसी भी अन्य बीमारी की तरह, भेदभाव नहीं करती है। यह हर आयु वर्ग, वित्तीय स्थिति, शहरी एवं ग्रामीण परिवेश में मौजूद है। भारत सरकार के आकड़े बताते हैं कि देश की लगभग 70 प्रति शत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है जहाँ समर्थन के पर्याप्त साधन प्राप्त करता चुनौतिपूर्ण है। इस ज़रूरत को समझते हुए लिव लव लाफ ग्रामीण समुदायों की ज़रूरतमंद आबादी का समर्थन करता है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2022 के अवसर पर एलएलएल का ग्रामीण कार्यक्रम तमिलनाडु स्थित तिरुवल्लूर गया था। इस यात्रा की झलकियाँ देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

उद्देश्य एवं कार्यान्वयन

लिवलवलाफ ने अपने ग्रामीण कार्यक्रम – कम्यूनिटी मेंटल हेल्थ प्रोग्राम – की शुरुआत 2016 में की ताकि समग्र दृष्टिकोण से ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर और मज़बूत किया जा सके।  


यह दृष्टिकोण टिन मुख्य तत्वों पर आधारित है: 


  • जागरूकता: नुक्कड़ नाटकों, दीवार पर पेंटिंग और फ्रन्टलाइन वर्कर्स (पहली पंक्ति के कर्मियों) को मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल के विषय में लगातार प्रशिक्षण देने जैसी गतिविधियों के माध्यम से हम जागरूकता फैलाते हैं।   

  • पहुँच: हम मानसिक रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों और उनकी देखभाल करने वाले लोगों तक साइकियाट्रिक ट्रीटमेंट, साइकोसोशल सपोर्ट और पुनर्वास की योजनाओं को उनके गांवों तक पहुँचाते हैं।    

  • सुलभता: हालांकि लाभार्थियों को मुफ़्त में मुहैया करवाया जाता है, मगर हम उन्हें सरकारी योजनाओं से भी जोड़ते हैं जिससे मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल आसान हो जाता है। 


इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू देखभाल करने वालों को प्राथमिकता देना है। देखभाल करने की उनकी क्षमता को बेहतर बनाने की लिए हम उन्हें प्रशिक्षित करते हैं, उनके स्वास्थ्य की जरूरतों पर ध्यान देते हैं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने में उनकी मदद करते हैं ताकि वे अपने परिवारों को सहारा दे सकें। 


फिलहाल यह कार्यक्रम कर्नाटक के दावणगेरे, मैसूर, बेलगावी और गुलबर्गा ज़िलों; उड़ीसा के कोरापुट और पुरी ज़िलों; तमिलनाडु के तिरुवल्लुर और तेनी ज़िलों; हिमाचल प्रदेश के कंगड़ा ज़िले; केरल के इडुक्की ज़िले; और मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले में चल रहा है। 

  • डिलीवरी का माध्यम
    व्यक्तिगत एवं ऑनलाइन
  • भाषाएँ
    स्थानीय भाषाएँ
  • भौगोलिक परिधि
    दावणगेरे, मैसूर, बेलगावी और गुलबर्गा (कर्नाटक)। तिरुवल्लुर और तेनी (तमिलनाडु)। कोरापुट और पुरी (उड़ीसा), छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश), कंगड़ा (हिमाचल प्रदेश) और इडुक्की (केरल)।

इस कार्यक्रम के सतत विकास के कारण क्या हैं?

लिवलवलाफ के ग्रामीण कार्यक्रम का उद्देश्य मानसिक रोगों से ग्रस्त लोगों और उनकी देखभाल करनेवालों को मेंटल हेल्थकेयर डिलीवरी के एकत्रित और सतत विकास मॉडेल के माध्यम से समर्थन प्रदान करना है। 


सावधानी से बनाए गये ढांचे के जरिए समुदायों का समर्थन करने के लिए विभिन्न तरह के हितधारकों के समूहों का गठन किया जाता है और उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है। गाँव के स्तर पर देखभाल करने वालों का समूह, ब्लॉक स्तर पर फेडरेशन समूह एवं तालुक और ज़िला स्तर पर अभिभावक चैंपियन समूह बनाए जाते हैं।


इन सपोर्ट ग्रुप्स को, जिनमें आशा कार्यकर्ता और कम्यूनिटी वालंटियर (समुदाय के स्वयंसेवी) भी शामिल हैं, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता का पक्षसमर्थन करने के लिए जरूरी ज्ञान और कौशल मुहैया कराए जाते हैं। आशा कार्यकर्ताओं को मानसिक रोगों से ग्रस्त लोगों की पहचान करने और उनका समर्थन करने के लिए भी प्रशिक्षित किया जाता है। सभी हितधारकों को प्रोग्राम की पहुँच और इसके असर को समुदायों में आगे लेकर जाने के लिए सक्षम बनाया जाता है। 


समय के साथ ये समूह कुशल और आत्मनिर्भर बनते जाते हैं जिससे एलएलएल का कम्यूनिटी मेंटल हेल्थ प्रोग्राम एक स्वःचालित मॉडेल बन जाता है। मानसिक स्वास्थ्य को समर्थित करने में ये समुदाय की जिम्मेदारी और सशक्तिकरण से फलता-फूलता रहता है।


आगे का रास्ता

यह ग्रामीण कार्यक्रम लिवलवलाफ का सबसे महत्वपूर्ण प्रयास बनता जा रहा जिसका उद्देश्य ग्रामीण भारत के मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की क्षमता में कारगर परिवर्तन लाना है। इसे लेकर हमारी आगे योजना ज़मीनी स्तर पर काम कर रही संस्थाओं के साथ साझेदारी में कई और क्षेत्रों में इसका प्रसार करना है। मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल तक सभी पहुँच सकें और यह सभी के लिए सुलभ हो - यह सुनिश्चित करना एलएलएल की प्रतिबद्धता है और यही इस प्रसार का मूलभूत है। 

2016 में शुरुआत होने से लेकर

  • 10,968
    प्रत्यक्ष लाभार्थी
  • 27,891
    परोक्ष लाभार्थी
  • 21
    तालुकों में काम किया गया है

प्रशंसा पत्र

चाँदअन्ना 23 वर्ष का है और एक निम्न-मध्यवित्तीय परिवार से है जिसमें कुल 4 सदस्य हैं। उसमें मानसिक बीमारी के लक्षण 6 साल पहले नज़र आये। वह अक्सर लड़ाई करता, काम पर ध्यान देने में उसे दिक्कत होती, वह ठीक से सो नहीं पाता और उसे अजीब आवाज़े सुनाई देती थी। चाँदअन्ना की मानसिक बीमारी से उसके परिवार पर कहर बरस पड़ा। उसके इलाज के लिए हर महीने 3000 रुपये लगते थे जिसने उसके परिवार को आर्थिक संकट में डाल दिया था। उसकी हालात देखकर उसकी माँ अवसादग्रस्त हो पड़ी और उसे आत्महत्या का ख्याल आने लगा। एलएलएल कार्यक्रम में इन दोनों को दर्ज किया गया जिसके बाद उन्हें मुफ्त दवाइयाँ और इलाज मिलने लगा। परिवार की काउंसेलिंग की गई और उनके लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई ताकि रोज़गार की समस्या का समाधान किया जा सके। इस कार्यक्रम से माध्यम से उनके सम्पूर्ण पुनर्वास और बीमारी से मुक्त होने की प्रक्रिया को मुफ्त में मुहैया कराया गया। इससे उसके परिवार थी स्थिति में भी सकारात्मक बदलाव आया है। चाँदअन्ना की माँ अब कार्यक्रम में एक सामुदायिक कार्यकर्ता के रूप में काम करती है।

चाँदअन्ना की कहानी

मैं कोरापुट से जागु सीसा हूं। पहले मैं पारंपरिक दवाओं का इस्तेमाल करता था  और अपने इलाज के लिए मैंने अंधविश्वास का भी सहारा लिया,  लेकिन उन सब से मुझे कोई सुधार नहीं दिखा। फिर  मुझे जेयपोर के जिला अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर की सलाह के अनुसार  मैंने अपनी दवाएं लेना जारी रखा। मेरे मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति में अब काफी सुधार है और मैं दिन–प्रतिदिन के अपने काम कर लेता हूं। महामारी के दौरान मैं अपनी दवाइयां  नहीं ला पा रहा था,  लेकिन  स्प्रेड  टीम  ने  मेरी  दवाइयां  घर  तक  पहुंचाईं। मैं उनकी इस  मदद के लिए आभारी हूं।

जागु सीसा, कोरापुट - उड़ीसा

केनचम्मा में मानसिक बीमारी के लक्षण दिख रहे थे, जिसमें भूख कम लगना और नींद की गड़बड़ी शामिल थे। उसके परिवार को लगा कि ऐसा बुरी आत्माओं और भगवान से मिली सजा के कारण हो रहा है। वे मंदिरों में गए लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। इसके बाद उसे पड़ोसी जिले के एक वार्ड में भर्ती कराया गया, जहाँ परिवार ने इलाज, दवा, यात्रा आदि पर भारी खर्च किया। मगर चूंकि वे नियमित रूप से दवाईयों का खर्च नहीं उठा पा रहे थे, इसलिए उसके लक्षण दोबारा दिखाई देने लगे। 2019 में उसने अपने गाँव में एक चिकित्सा शिविर में भाग लिया और उसे मुफ्त इलाज और दवा मिलने लगी। उसके माता–पिता अब हर महीने पैसे बचा पाते हैं। उसकी हालत अब स्थिर है, और वह अब कपड़े सिलकर अपने लिए पैसे कमाती है। वह घरेलू काम भी करती है, अपने बूढ़े माता–पिता की देखभाल करती है और खेती के काम में अपने भाई की मदद भी करती है।

केंचाम्मा की कहानी

कार्यान्वयन साथी

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